मुआवजा ठुकराया तो अधिग्रहण को चुनौती नहीं: कोर्ट मुआवजा ठुकराया तो अधिग्रहण को चुनौती नहीं: कोर्ट
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मुआवजा ठुकराया तो अधिग्रहण को चुनौती नहीं: कोर्ट

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नई दिल्ली। भूमि अधिग्रहण कानून पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए कहा, जो जमीन मालिक मुआवजा लेने से इनकार करते हैं, वे भूमि अधिग्रहण रद्द करने का दबाव नहीं डाल सकते। जस्टिस अरुण मिश्रा की अगुआई वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने यह फैसला भूमि अधिग्रहण कानून, 2013 की धारा 24 की व्याख्या करते हुए दिया।

पीठ ने कहा, उसकी मंशा यही है कि असली जमीन मालिक को लाभ मिल सके। अधिग्रहण प्रक्रिया शुरू होने के बाद बीच में कई मध्यस्थ आ जाते हैं, जो जमीन की ज्यादा कीमत सरकार से वसूलने के लिए प्रक्रिया में अड़ंगा लगाते हैं। पीठ ने कहा कि मुआवजे की रकम कोर्ट में जमा न करने से अधिग्रहण समाप्त नहीं मान सकते। सिर्फ उन्हीं मामलों में पुराने कानून के तहत शुरू अधिग्रहण प्रक्रिया रद्द होगी, जिनमें वर्ष 2013 के अधिनियम के प्रभावी होने वाले दिन (एक जनवरी 2014) से पांच वर्ष या इससे अधिक तक सरकार ने न तो मुआवजा दिया हो और न ही जमीन पर कब्जा लिया हो।

पीठ ने भूमि अधिग्रहण कानून की व्याख्या को लेकर 2014 में पुणे नगर निगम और 2018 में इंदौर विकास प्राधिकरण मामलों में आए फैसलों को निरस्त कर दिया।

जरूरी नहीं कि मुआवजा कोर्ट में जमा हो
कोर्ट ने माना कि अगर अधिग्रहण प्रक्रिया शुरू होने के बाद सरकार ने मुआवजे का एलान कर दिया और उसे सरकारी कोष में जमा करा दिया है, तो यह जरूरी नहीं कि कोर्ट में जमा कराया जाए। एक पुराने फैसले के तहत इस बात का प्रावधान था कि अगर किसान मुआवजा नहीं ले रहा है तो सरकार उसे कोर्ट में जमा कराए, नहीं तो अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी नहीं मानी जाएगी।

अब पीठ ने कहा, अगर सरकार ने मुआवजे के लिए मंजूर राशि अपने कोष में जमा करा रखी है तो फिर भूमि मालिक की तरफ से वहां से पैसा नहीं उठाना सरकार की गलती नहीं मानी जाएगी।




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